मंगलवार, 17 मार्च 2015

वक़्त गया वो बीत !

रिश्तों के मन बाग़ में, सूखे जब से फूल !
अपनेपन की तितलियाँ,गई सभी को भूल !!
-----------------------------------------
नारी तन को बेचती,आया कैसा दौर !
मूर्त अब वो प्यार की,दिखती है कुछ और !!
----------------------------------------
गाँव सभी अब हो गए,राज़नीति के मंच !
झूठी बातें कर रहे,पंचायत और पंच!!
----------------------------------------
जिनको पंछी की रही,नहीं कभी पहचान !
कह दूँ कैसे मैं उन्हें ,सुन कोयल की तान !
---------------------------------------
सूखा दरख़्त कह रहा.वक़्त गया वो बीत !
हरे जिस्म से थी कभी,जाने कितनी प्रीत !!

1 टिप्पणी: