सोमवार, 26 दिसंबर 2011

देख बुरे हालात !

आज़ादी के बाद भी, देश रहा कंगाल !
जेबें अपनी भर  गए, नेता और दलाल !!

क़र्ज़ गरीबों का घटा, कहे भला सरकार!
विधना के खाते रही, बाकि वही उधार!!

हर क्षेत्र में हम बढे, साधन है भरपूर !
फिर क्यों फंदे झूलते, बेचारे मजदूर !!


 लोकतंत्र अब रो रहा, देख बुरे हालात !
संसद में चलने लगे, थप्पड़-घुसे लात !!

देश बाँटने में लगी, नेताओं की फौज !
खाकर पैसा देश का, करते सारे मौज !!

फूंकेगी क्या-क्या भला, ये आतंकी आग !
लाखों  बेघर हो गए, लाखों मिटे सुहाग !!



गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

करे फूल से प्यार !

जो महके है फूल-सा, करे फूल से प्यार !
पल-पल बढ़ता ही चले, आगे सभी प्रकार!!

यदि धरती ना बांटती, फूलों का उपहार !
तब प्रेमी कैसे भला, कर पाते इज़हार !!

 रखता मन में जो सदा, फूलों-सी मुस्कान !
उसके सारे काम  तब , हो जाते आसान !!


मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

बचपन का वो गाँव !

यादों में आता रहा, बचपन का वो गाँव !
कच्चे घर का आँगना, और नीम की छाँव!!



बैठे-बैठे जब कहीं , आता बचपन याद!
मन चंचल करने लगे, परियों से संवाद !!


मुझको भाते आज भी , बचपन के वो गीत !
लोरी गाती मात की , अजब निराली प्रीत !!



आओ! मेरे साथियो, कर ले उनका ध्यान !
शान देश की जो बने, देकर अपनी जान !!

खूब यहाँ मुझको मिली, यारों की सौगात !
खिंचा सबने हाथ जब, आई दुःख की रात !!

मुझको जीवन से मिले, अलग-अलग अहसास !
कुछ खट्टे अंगूर से, कुछ में भरी मिठास !!

जीवन में सबको मिले, बस इतने उपहार !
महके-महके से रहे , रिश्ते खुशियाँ प्यार !!

भारत में है हर जगह , भाषा-भेष अनेक !
मिलजुल के सारे रहे , बनके सारे एक !!


सोमवार, 5 दिसंबर 2011

गीत हुए अनबोल !

अद्यापन मण्डी हुआ, शिक्षा हुई व्यापर !
छात्र लादे घूमते, पाठ्यक्रम का भार !!

घूम रहे है आजकल, गली-गली में चोर !
खड़ा मुसाफिर सोचता, जाये अब किस ओर !!

कब तक महकेगी भला, ऐसे सदा बहार !
माली ही जब लूटते, कलियों का संसार !!

स्याही,कलम,दावत से, सजने थे जो हाथ !
कूड़ा-करकट बीनते,  नाप रहे फूटपाथ !!

भाव-शून्य कविता हुई, गीत हुए अनबोल !
शब्द बीके  बाज़ार में, जब कौड़ी के मोल !! 

शनिवार, 3 दिसंबर 2011


हो जाता है खून !

मन से मन का मेल हो, पले  प्यार भरपूर !
मानवता के पथ खुले, भेद रहे सब दूर !!

अपने हित में साथियों , कर लो इतना ख्याल !
दो बच्चों से घर सदा, रहता है खुशहाल !!

अब तो आये रोज ही , टूट रहे परिवार !
फूट-कलह ने खींच दी , हर आँगन दीवार !!

अपराधी अब छूटते, तोड़े सभी विधान !
निर्दोषी हवालात में ,वाह! मेरे संविधान !!

पद-पैसे की आड़ में ,बिकने लगा विधान!
सरेआम अब घूमतें, अपराधी-शैतान !!

कैसी ख़बरें ला रहा , रोज-रोज अखबार !
हर पन्ने पे खून है , हर अक्षर दुराचार!!

जब पैसों के मोल में, बिकता है कानून !
खंजर बिना गरीब का , हो जाता है खून !!










शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

कोई गीत मल्हार !!

उषा उतरी पूरब से , कर सोलह श्रृंगार !
मानो दुल्हन लिए खड़ी, कोई हीरक हार !!

नदियाँ तट पे जब हवा, गए फाल्गुन राग !
भोरें आतुर हो उठे , पाने मस्त पराग !!

नयी सुबह का आगमन, लगे तीज -त्यौहार !
मिलजुल के गाये सभी, कोई गीत मल्हार !!



बस आडम्बर रूप है , पूजा-जप-तप ध्यान !
मन की आँखें देखती , कण -कण में भगवान!!

रोम -रोम में आप हो , आप रमें हर पोर !
आप मिले सब कुछ मिला , बाकि है क्या और !!

मानव को कैसे मिले , जीने का अधिकार !
बना रहे हर रोज हम , खतरनाक हथियार !!





गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

बोलो मेरे राम

जिनके हाथों डोर दी , बेचा उनने देश !
भूख -गरीबी के सिवा , छोड़ा क्या है शेष !!

थाने इज्ज़त लूटतें, कोर्ट करे अन्याय !
बोलो मेरे राम अब, कहाँ मिलेगा न्याय !!



ऊँच-नीच के भेद सब, माती देत मिटाय!
माटी में मिलके सभी, एक रूप हो जाय !!

माटी चन्दन मानिये , माटी गुण की खान !
इस माटी में ही पले, राम-कृषण भगवान!!

बसंत ऋतू के साज़ पर , फूलों ने दी ताल !
सरसों नाची खेत में , थिरकी सारी डाल !!