सोमवार, 5 दिसंबर 2011

गीत हुए अनबोल !

अद्यापन मण्डी हुआ, शिक्षा हुई व्यापर !
छात्र लादे घूमते, पाठ्यक्रम का भार !!

घूम रहे है आजकल, गली-गली में चोर !
खड़ा मुसाफिर सोचता, जाये अब किस ओर !!

कब तक महकेगी भला, ऐसे सदा बहार !
माली ही जब लूटते, कलियों का संसार !!

स्याही,कलम,दावत से, सजने थे जो हाथ !
कूड़ा-करकट बीनते,  नाप रहे फूटपाथ !!

भाव-शून्य कविता हुई, गीत हुए अनबोल !
शब्द बीके  बाज़ार में, जब कौड़ी के मोल !! 

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर कविता ...समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

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  2. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 28/07/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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