शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

कोई गीत मल्हार !!

उषा उतरी पूरब से , कर सोलह श्रृंगार !
मानो दुल्हन लिए खड़ी, कोई हीरक हार !!

नदियाँ तट पे जब हवा, गए फाल्गुन राग !
भोरें आतुर हो उठे , पाने मस्त पराग !!

नयी सुबह का आगमन, लगे तीज -त्यौहार !
मिलजुल के गाये सभी, कोई गीत मल्हार !!



बस आडम्बर रूप है , पूजा-जप-तप ध्यान !
मन की आँखें देखती , कण -कण में भगवान!!

रोम -रोम में आप हो , आप रमें हर पोर !
आप मिले सब कुछ मिला , बाकि है क्या और !!

मानव को कैसे मिले , जीने का अधिकार !
बना रहे हर रोज हम , खतरनाक हथियार !!





2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी सुन्दर रचना पढ़ी, सुन्दर भावाभिव्यक्ति , शुभकामनाएं.

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने की अनुकम्पा करें.

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